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Showing posts from 2020

love jihad

'लव जिहाद' का भूत एक बार फ़िर से भारत को सता रहा है। भारतीय समाज मूल रूप से प्रेम का विरोधी है। एक ऐसा समाज जहां प्रेम के बजाय दहेज को अधिक महत्व दिया जाता है, एक ऐसा समाज जहां महिलाओं को महज उनकी पसंद का साथी चुनने के लिए 'खोखले सम्मान’ के नाम पर मार दिया जाता है, उस समाज से प्रेम और सौहार्द की उम्मीद करना ही बेमानी है।  रविश कुमार ने 'लव जिहाद' के नाम पर चल रहे साजिश को बख़ूबी बेनकाब किया है। इक ऐसा समाज जो सोते जागते हिंदी फ़िल्मों का प्रेम तो गीत सुनता है लेकिन प्रेम से इतना डरता है कि डर का पूरा भूत ही खड़ा कर देता है। उसी भूत का नाम है 'लव जिहाद'। भारतीय समाज में पुरुषों के विजय और औरतों के जीवन पर एकाधिकार का रूप है 'लव जिहाद'। उस समाज की बेवक़्त, सियासी जरूरत है 'लव जिहाद' जिस समाज में आये दिन होने वाले बलात्कार का भूत कभी इजाद नहीं होता और होगा भी कैसे, समाज की कड़वी सच्चाई उजागर हो जाएगी जिसे झूठी मर्दानगी के तले दबा दिया गया है।  मध्यप्रदेश में लव जिहाद ’के संबंध में कानून की हालिया घोषणा उन लोगों के लिए ताबूत में आखिरी कील है, जिनक...

पीरियड्स लीव पर बिहार सरकार का ऐतिहासिक फैलसा जिसे हर किसी ने अनदेखा किया

मासिक धर्म/पीरियड्स भारत में एक बहुत बड़ा समाजिक मुद्दा रहा है। हाल के दिनों में भारत की फूड डिलीवरी कंपनी जोमेटो ने इस दिशा में एक नई शुरुआत की है। कंपनी ने अपनी महिला कर्मचारियों को साल में 10 दिन की छुट्टी पीरियड्स के लिए देने का ऐलान किया है। इस ऐलान के बाद एक बार फ़िर से पीरियड्स लीव को लेकर बहस छिड़ गयी है।  भारत में मासिक धर्म और उससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं की जानकारी अधिकतर महिलाओं को नहीं है। मासिक धर्म पर हमारी धारणा आमतौर पर नकारात्मक और ग़लत है और  समाजिक धारणाओं की वजह से इस पर खुल कर बात नहीं किया जाता है। पितृसत्ता ने सदियों की मेहनत के बाद ‘मासिक-धर्म को गंदी बात’ बताकर महिलाओं के दिमाग में इसके खिलाफ़ बहुत सी ग़लत बातें बिठा दी हैं जिसकी वजह से मासिक धर्म होने को कई लोग ‘बीमारी’ मानते हैं, तो कोई इस वक़्त में औरत को अछूत और अपवित्र कहता है। जिस देश में महज 36% महिलाएं/लड़कियाँ पीरियड्स के दौरान सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर पाती हैं वहाँ पीरियड्स लीव का जिक्र ख़ुद में बहुत बड़ी बात है। यह बात उस वक़्त और भी अहम हो जाती है जब मालूम चलता है कि आज से...

महिलाओं का संपत्ति में बराबरी का अधिकार : समाजिक पृष्ठभूमि की सच्चाई

महिलाओं का संपत्ति में बराबरी का अधिकार : समाजिक पृष्ठभूमि की सच्चाई बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है । यह फैसला लैंगिक समानता की ओर एक सराहनीय कदम है। अपना फैसला सुनाते समय कोर्ट ने कहा; बेटियां भी बेटों की तरह जन्म के साथ पैतृक संपत्ति में बराबरी की हकदार हैं। संपत्ति के अधिकार को लेकर 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम कानून लागू हुआ था। इसे 2005 में संशोधित करते हुए बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबरी का भागीदार बनाया गया था। लेकिन इस संशोधिन में यह स्पष्ट नहीं था कि हिंदू उत्तराधिकार ( संशोधन) अधिनियम, 2005 के लागू होने से पहले अगर पिता की मृत्यु हो गयी होगी तो उन बेटियों को पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मिलेगा या नही। सुप्रीम कोर्ट ने दानन्मा बनाम अमर (2018) के मामले में फैसला सुनाते हुए उन सारे सवालों को स्पष्ट किया जिसके कारण बेटियों को संपत्ति में अपना हिस्सा पाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।  पैतृक संपत्ति सबसे पहले यह जानने की जरूरत है कि पैतृक संपत्ति होता क्या है। किसी भी पुरुष को अ...

तड़प......

जाने कौन सी तड़प है ये आधी रात में यूं ही दबे पांव आती है एक दर्द सा उठता है सीने में कचोट डालता है पूरे मन को झकझोरे देता है मेरे तन को आंसुओ की लड़ियाँ कब सैलाब बन तकिये को गीला कर देती हैं पता ही नही चलता हैरानी तो इस बात की है कि आखिर ये कौन सा दर्द छुपा रखा है सीने में जिसकी भनक कभी खुद नही हुई जाने कब ये दर्द नासूर बन वक़्त बेवक्त चुभने लगा उस मछली की तरह जो कुछ पल को पानी से जुदा होकर तड़पने लगती है उस फूल की तरह जो खुद तो टूटकर दूसरों के घर को रौनक देती मगर उस पौधे से बिछड़ने का दर्द कोई महसूस नही कर पाता......

अस्तित्व की लड़ाई

जब कभी इंसान किसी मुद्दे पर अपनी राय रखता है तो सबसे पहले उसका विशेषाधिकार आड़े आता है। किसी स्ट्रगल को समझने के लिए सबसे पहले उसके हालात को समझना जरूरी होता है।  मेरा खुद का अनुभव है कि चाहे हमसब कितना भी दावा क्यों ना कर लें लेकिन प्रिविलेज पोजिसन पर बैठ कर शोषित वर्ग के संघर्ष को नहीं समझ सकते हैं। अमेरिका में जो कुछ भी हो रहा है वो सदियों से चले आ रहे संघर्ष का नतीजा है। मैं ख़ुद किसी भी तरीके के हिंसा में यकीन नहीं रखती हूँ लेकिन हिंसा की वजह क्या है उसे जानना सबसे ज्यादा अहम रखता है। तोड़ फोड़ मचाना ग़लत है लेकिन उससे भी ज्यादा ग़लत है एक इंसान को अपने बल का प्रयोग कर के जान से मार देना।  जब हर इंसान के खून का रंग एक है फ़िर चाहे वो आदमी हो औरत हो या फ़िर तीसरा जेंडर फ़िर हमें किसने अधिकार दिया उन्हें किसी से कमतर मानने का। लिंग, जाति, धर्म और नस्ल के नाम पर किसी को दबाना, नीचा दिखाना और बराबरी का दर्जा ना देना सिर्फ और सिर्फ पॉवर पॉलिटिक्स और अपर कास्ट प्रिविलेज मेंटेलिटी है और कुछ नहीं।  जिनका ख़ुद का जीवन ही अस्तित्व की लडाई हो उनके लिए ख़ुद की आवाज़ को किसी भी त...

थप्पड़

सिर्फ एक थप्पड़ ही तो है लेकिन नहीं मार सकता कोई। अनुभव सिन्हा ने दिल निचोड़ कर रख दिया। एक मर्द होते हुए जिन बारीकियों से उन्होंने औरतों की ज़िंदगी को पेश किया है वो क़ाबिले तारीफ है। साथ ही में इस नैरेटिव को भी क्वेश्चन करता है कि सिर्फ औरतें ही एक औरत की जीवनी को पूरी सच्चाई के साथ पेश कर सकती हैं।   यह कोई मूवी रिव्यु नहीं है तो इसकी सारी बारीकियों को ना छू पाने के लिए खेद चाहती हूँ। इस लेखनी के ज़रिये मैं अपने दिल में दबें वो हज़ारों सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही जिसने मुझे अंदर से विचलित कर दिया है।   बहुत सी बातें हैं कहने को लेकिन पन्ने शायद कम पड़ जाएं। ऐसा लग ही नहीं रहा था जैसे कोई मूवी चल रही हो। आंखों के सामने हर रोज ऐसी ही ज़िन्दगी जीती हुई हज़ारों लड़कियाँ दिख रही थीं। मूवी शुरू तो होती है अमृता (तापसी पन्नो) से लेकिन हर उस औरत की ज़िंदगी को छू लेती है जो इस पितृसत्तामक समाज में खुद से जद्दोजेहद कर रही हैं। जब मूवी का ट्रेलर देखा तो मुझे भी लगा कि सिर्फ एक थप्पड़ के वज़ह से तलाक़ लेना बहुत बड़ी बात है लेकिन जिन बारीकियों से दिखाया गया इन औरतो...